किसी अन्य के लिए किया गया कार्य


छठी कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा को पाठशाला से बहुत सारा गृह-कार्य करने को मिला। उसने मुझसे कहा “आज तो मैं अपना गृह कार्य  अपनी बड़ी दीदी से   करवा लूंगी”। मैंने कहा तुम्हे  अपना कार्य स्वयं करना चाहिए। तब उसने कहा ” मैं भी तो उसका बहुत सा काम करती हूँ। उसके ले टी.वी. चालू करती हूँ, उसका लेप-टॉप उठाकर के उसको देती हूँ, उसको पानी पिलाती हूँ, उसके कपडे तह करके रखती हूँ” 🙂 ।
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अपना-अपना दृष्टिकोण


परस्थितिवश पुत्र को अपने माता-पिता के साथ रहना  पड़ा । आंशिक रूप से उन पर निर्भर रहना  पड़ा। “पिताजी” अपना ज्यादातर समय पूजा-पाठ और धार्मिक पुस्तकों को पढ़कर बिताते थे। भगवान की पूजा  करते समय दुग्धाभिषेक भी करते थे,जिसमें  कि दूध का उपयोग थोडा ज्यादा ही करते थे । एक दिन पिताजी से पुत्र ने कहा कि “आप पूजा के विधि-विधान में बहुत सा दूध उपयोग में लाते हैं। पूजा में उपयोग होने वाले दूध की मात्रा थोड़ी कम कर दीजिये। दुनिया में कितने ही बच्चों को दूध की एक बूँद भी नसीब नहीं होती है।”  उत्तर में पिताजी ने कहा ” तुम्हारे सर पर जो ये छत है वो ही बहुत हैं”।

दोगलापन


बालिका जो कि अपना पसंदीदा कार्टून चैनल देख रही थी, तभी अचानक बिजली गुल हो गयी। इनवर्टर होने कि वजह से बिजली आती रही लेकिन इनवर्टर पर ज्यादा लोड न हो इसलिए घर के बुजुर्ग  उसे टी.वी. बंद करने के लिए कह रहे थे। बड़े दुखी मन से उसने टी. वी. बंद कर दिया। कुछ देर पश्चात् ही बुजुर्गों के पसंद के टी. वी. कार्यक्रम “बालिका-वधू” का समय हो गया और वे बिजली न होने पर भी अपने पसंद का टी.वी पर कार्यक्रम देखते रहे और बालिका अपने बुजुर्गों के  दोगलेपन से व्यथित होती रही।

साथ


 एक छात्र मुझसे गणित विषय पढ़ने आता है। वह बहुत ही बेमन से गणित के प्रश्न हल करता है। कुछ दिन पहले ही एक और छात्र गणित पढ़ने आने लगा। पहले ही दिन मैंने देखा कि प्रथम छात्र बहुत मन लगाकर गणित कर रहा है। दूसरे दिन देखा तो आते ही बहुत उत्साह के साथ उसने कहा कि जल्दी बताईये कौनसा सवाल हल करना है। केवल एक और साथी छात्र आने से ही उसके व्यवहार में इतना परिवर्तन आ गया था जो कि उसे उत्साह के साथ गणित करने के लिए प्रेरित कर रहा था।

प्रथम व्यक्ति


बेटी प्रश्न करती है कि ” मेरे पिताजी हैं। मेरे पिताजी के पिताजी दादाजी हैं, दादाजी के भी पिताजी थे इस तरह दुनिया में जन्म लेने वाला प्रथम व्यक्ति कौन था”।

इंसानियत


कुछ दिन पहले हम भोपाल से लगभग ९० किलो मीटर दूर बाड़ी-बरेली की ओर  बस से जा रहे थे। सुबह का ८ बजे का समय था। बस ७-८ किलो मीटर आगे चलकर एक स्टॉप पर रुक गयी। देखा तो बहुत सारे  लोगों की भीड़ थी उनमे से एक स्त्री ४ माह की अपनी बेटी के साथ बस में चढ़ रही थी। बस में  बैठने के लिए एक भी सीट खाली नहीं थी। हमारे बाजू में एक मौलानाजी जो  की बुजुर्ग थे उस स्त्री को देखते ही उठ खड़े हुए और  उसको बैठने के लिए जगह दे दी।  हम लोगों ने भी थोड़ा-थोड़ा सरक कर  मौलानाजी के लिए थोड़ी सी जगह बना दी ताकि वो भी बैठ सकें। बहुत देर तक एक ही स्थिति में अपनी बेटी को लेकर बैठेने से उस स्त्री को बैठने में परेशानी हो रही थी। फिर से एक बार मौलानाजी को उसने अपनी परेशानी बताई तो वो झट से खड़े हो गए और उस स्त्री को आराम से बैठने के लिए जगह दे दी।

अव्यक्त मौन


माँ अपने बच्चे पर हाथ उठाकर स्वयं को ही ज्यादा दुःख पहुंचाती है। कुछ ऐसा ही कल मैंने महसूस किया जब मैंने किसी बात पर क्रोधित होकर अपनी बेटी की पिटाई की। पिटाई होने पर भी वह बिलकुल नहीं रोई जो कि सामान्य से अलग उसका व्यवहार था। वह बहुत अच्छे से जानती थी कि गलती वास्तव में उसने की थी। उसने बहुत देर तक मेरी कही गयी बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उसकी जिस बात पर मैंने पिटाई कि थी उस सम्बन्ध में मैंने पहले भी उससे बहुत गहनता के साथ विचार-विमर्श किया था और उसने मुझे विश्वास दिलाया था कि वह पुनः ऐसा नहीं करेगी। मैंने कल भी उसे एक अच्छी सी कहानी सुनाकर उसे मेरी बात समझाने का प्रयास किया और बिटिया भी मेरी बात से सहमत हो गयी कि उसे मेरी बात बहुत अच्छे से समझ में आ गयी है। कुछ देर बाद मैंने उसको पुछा कि जब माँ ने तुम्हारी पिटाई लगायी तो तुम्हे माँ पर क्रोध नहीं आया क्या? उसने अपने उत्तर में बस इतना ही कहा कि जब आप मुझ पर क्रोधित हो रहे थे तो मैं चुप रहकर अपना क्रोध ही तो व्यक्त कर रही थी।