मन की कुलबुलाहट


कल  संध्याकाल से ही मेरी बेटी के मन में रंगों भरी पिचकारी चलाने के लिए कुलबुलाहट हो रही थी  |  जब शाम को पिचकारी खरीद कर लायी गयी तो उसका मन कर रहा था कि रात में ही होली खेल ले | पानी भर -भर के पिचकारी  से इधर -उधर बौछार की  गयी | होली खेलने के लिए सुबह का भी इन्तजार करते नहीं बन रहा था |
 
सुबह उठते ही बाल्टी भर कर रंग बनाया गया |बस इन्तजार ख़त्म हुआ और रंगों की  बौछार शुरू हो गयी | मुझे लग रहा था शायद उसे रंग लगवाना और होली खेलना पसंद नहीं होगा |देखा तो बस थोड़ी ही देर में होली के रंगों से सरोबार थी  | इतने  ज्यादा उत्साह में थी कि पता नहीं किस- किस पर  रंग डाले जा रही थी | अंत में कोई नहीं था खेलने वाला तो घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर जो कोई भी दिख रहा था उन पर रंग डाल  रही थी | बहुत मनाने पर उसने रंगों को दूसरों पर डालना बंद किया |
 
बच्चों को किस बात से कितनी ख़ुशी होगी यह जान पाना बहुत कठिन होता है|  बच्चें  हमेशा ऐसा कुछ नया करते हैं कि हम लोग विस्मित हो जाते हैं| इस प्रकार  उनके व्यवहार में नयापन ही हमें उर्जावान बनाये रखता हैं | यह नयापन ही जीवन का रस है |

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