विश्वास


विश्वास एक ऐसी डोर हैं जो किन्हीं  भी दो व्यक्तिओं  को आपस में मजबूती के साथ बांधे रखती है |  विश्वास ही है जो माता-पिता और संतान के बीच के संबंधो को मजबूत करती है | हम अपने बच्चों के व्यक्तित्व को इतना मजबूत बनाएं कि वो हम से किसी भी प्रकार कि अपनी बात को कह पाए | उसे  विश्वास हो कि उसकी  हर बात को बहुत ध्यान से सुना जाएगा |  बात सुनाने पर उस पर अपने विचारों को थोपा नहीं जायेगा |  हम अपनी बात को बच्चे के सामने रख सकते हैं |  वो हमारी बात को भी ध्यान से सुन ले | सुनने के बाद उसको पूरा मौका दें | उसे जो उचित लगता है वह करने कि लिए वो पूरी तरह स्वतंत्र है | जब इस प्रकार का संवाद माता-पिता और संतान के मध्य हो तो सम्बन्ध हमेशा के लिए मजबूत रहेंगे | जब हम बच्चों को ये कहते हैं कि तुम अपने – आप किसी  बात का निर्णय लो तो इस बात कि बहुत ज्यादा आशा होती है कि वो सही निर्णय लेंगें  है |  निर्णय लेने के साथ ही उनको अपनी  जिम्मेदारी का अहसास भी होने लगता है | निर्णय लेने की  क्षमता ही उसको अपने जीवन में अच्छा निर्णायक और दृढ़ निश्चय वाला बनाती है | किसी भी प्रकार कि परिस्थति में सकारात्मक मानसिकता वाला बनाती है |
 
बचपन से ही माता-पिता को इस विश्वास रुपी बीज को बोना पड़ता है  तभी समय के साथ ये विश्वास रुपी बीज वटवृक्ष का रूप धारण करता है | 

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