Archive for the ‘बच्चों का मनोविज्ञान’ Category


जब कोई शिशु जन्म लेता हैं तो उसके बिना कुछ कहे ही उसके माता – पिता अपने आप ही समझ जाते हैं कि उसकी आवश्यकता क्या हैं, और उसकी आवश्यकता कि पूर्ती कर देते हैं | लेकिन समय के साथ – साथ  न जाने ऐसा क्या हो जाता हैं कि हम उतनी आसानी से उसी बच्चे को समझ नहीं पाते हैं |
 
मेरी ८ वर्ष कि बेटी हैं | वो कल मेरी इस बात से नाराज हो गयी कि उसने जो चित्र बनाया था, उस चित्र बनाने में मैंने उसकी मदद कर दी जो उसे पसंद नहीं आई | उसने मेरी तकिया के नीचे  हिंदी में एक टिप्पणी लिखकर रखी थी जिसमें  उसने लिखा कि “आप मेरी मन कि बातों को समझ नहीं पाते हो” | मैंने उसकी इस टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा और समझने कि कोशिश करती रही कि क्या मैं सच में उसके मन को समझ नहीं पाती हूँ | मुझे क्या करना चाहिए कि उसकी भावानाये को मैं उसी रूप में समझ  सकू जो वो कहना चाहती हैं | अर्थात वो जो कुछ भी कहना चाहती हैं या मुझे समझाना चाहती है उसको बिना किसी त्रुटी के उसी रूप में ग्रहण कर सकूं |

Manmohani