अपने बारे में
अपने बारे में क्या लिखना चाहिए कुछ समझ में नहीं आ रहा है। अपने बारे में लिखने के लिए कुछ भी विशेष नहीं है। पहली बार मैं कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूँ। मेरा बचपन मध्यप्रदेश में बीता और मैं भौतिकी में स्नातकोत्तर हूँ। वर्तमान में बच्चों को गणित विषय पढ़ाती हूँ। मेरा पूरा ध्यान इसी बात पर होता है कि बच्चें गणित को कैसे खेल-खेल में सीख सकते हैं।
मेरा इस दुनिया में जन्म हुआ तो मैं अपने माता-पिता की बेटी थी। आज मैं एक बेटी की माँ हूँ। माँ बनने के बाद बच्चों के प्रति मेरा जिस प्रकार से दृष्टिकोण विकसित हुआ है, उस दृष्टिकोण से उत्पन्न हुई भावनाओं को ही अपने शब्दों में पिरोने की नाकाम कोशिश कर रही हूँ। हमारे आस-पास जो भी बच्चें हैं उनकी किस तरह भावनाएं हैं, वो कैसा महसूस करते हैं, इस सम्बन्ध में मैं अपने ब्लॉग में प्रस्तुत कर रही हूँ। हर छोटी-बड़ी बात जो बच्चें कहना तो चाहते हैं लेकिन कह नहीं पाते, उनकी मूक अभिव्यक्ति बहुत कुछ कहने की कोशिश करती है। बहुत बार उनके हाव-भाव उनकी शारीरिक भाषा बहुत कुछ ऐसा कहती हैं जिसे सही समझने से उनके व्यक्तित्व को नए आयाम दिए जा सकते हैं।
हमारे आस-पास होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन हमारे मन और मस्तिष्क पर बहुत गहरी छाप छोड़ते हैं। कुछ विषय तो ऐसे होते हैं जो हमें कहीं भीतर तक शूल जैसे चुभते हैं तो कुछ हमारे घावों पर मलहम लगाने का काम करते हैं। ऐसे ही कुछ विषयों पर मैं अपने विचार अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही हूँ।
मै मात् रि चरण से दूर चला, इसका दारुण संताप मुझे|
पर यदि कर्तव्य विमुख हूंगा, जीने से लगेगा पाप मुझे|
अब हार जीत का प्रश्न नहीं, जो भी होगा अच्छा होगा|
मरकर ही सही पितु के आगे, बेटे का प्यार सच्चा होगा|
भावुकता से कर्त्तव्य बड़ा, कर्त्तव्य निभे बलिदानों से|
दीपक जलने की रीत नहीं छोड़े डर कर तूफानों से|
यह निश्चय कर के वीर चला, कोई उसको रोक नहीं पाया|
चुप चाप देखता रहा पिता, माता का अंतर भर आया|
maaaaaaaaaaaaaaaa..