अभिभावक-शिक्षक मुलाकात एक स्वस्थ मुलाक़ात न होकर आरोप-प्रत्यारोप में बदल गयी है। विशिष्ट रूप से यह मुलाक़ात किसी भी विद्यार्थी का सम्पूर्ण विकास कैसे हो इस बात पर आधारित होनी चाहिए। सभी छात्रों की समस्याओं को एक ही तराज़ू में नहीं तोला जा सकता है। प्रत्येक छात्र के सोचने का ढंग विशिष्ट होता है। अध्ययन, व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याये किसी विशिष्ट छात्र की विशिष्ट होती है, उसका हल भी विशिष्ट ही होगा।
अभिभावक-शिक्षक मुलाकात में माता-पिता अपने बच्चे को अपने साथ लेकर आते हैं। छात्र से सम्बंधित चर्चा प्रारंभ होते ही शिक्षक माता-पिता को बताने लगते हैं कि ” यह कक्षा में ध्यान केन्द्रित नहीं करता है, बातें बहुत करता है, यह सफाई से नहीं लिखता है” इत्यादि। अब बारी होती है माता-पिता की माता-पिता भी अपनी तरफ से जितनी समास्याये बच्चे में देखते हैं बताने लगते हैं ” ये तो दिन भर टी.वी. देखता है, खेलने में इसका बहुत मन लगता है, हमारा कहना नहीं मानता है” और न जाने क्या-क्या। इन बातों से ही मुलाक़ात प्रारम्भ होती है और इन्ही बातों पर समाप्त भी हो जाती है। दोनों पक्षों में से एक भी पक्ष समस्याओं के समाधान पर बातचीत नहीं करते हैं। कभी कभी तो विद्यार्थी बहुत शर्मिंदा महसूस करता है। उसका पक्ष सुनने के लिए किसी भी पक्ष के पास समय नहीं है। किसी अपराधी की तरह वह चुपचाप बातें सुनता रहता है।
प्रत्येक विद्यार्थी के साथ होता है ऐसा नहीं है जो विद्यार्थी पढ़ाई में तेज होते है उनके साथ तो सभी अच्छे से व्यवहार करते हैं लेकिन जो विद्यार्थी पढ़ाई में पिछड़ा हुआ है उसके साथ ज्यादातर ऐसा होता है। इस प्रकार का व्यवहार उसके आत्म विश्वास को कमज़ोर करता है जिससे उसकी सोच सकारात्मक न होकर नकारात्मक होने लगती है।
मेरे विचार से अभिभावक-शिक्षक मुलाक़ात में विद्यार्थी की उपस्थिति की कोई आवश्यकता नहीं है। छात्र से सम्बंधित विषयों पर व्यक्तिगत बातचीत होनी चाहिए न की सार्वजनिक, समस्याओं का समाधान भी अभीभावक और शिक्षक को मिलकर करना है, विद्यार्थी को नहीं।