हमारे घर पर सहायिका के रूप में काम करने वाली युवती जो कि साक्षर नहीं है। मेरा बहुत मन था कि उसे साक्षर करने में मेरा कुछ योगदान हो। उसको बहुत बार पढाई-लिखाई के लिए प्रेरित करने की कोशिश करती रही, लेकिन उसने कुछ महीनो तक मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। मैंने भी उस से इस बारे में बात करना उचित नहीं समझा। कुछ महीनों बाद उसने अचानक मुझसे कहा कि वह मुझसे पढ़ना चाहती है। उसने एक दिन निश्चित कर लिया कि वह उस दिन से पढ़ना प्रारम्भ कर देगी, लेकिन वह पढ़ने के लिए नहीं आई। दो-तीन दिन बाद वह पढ़ने आई लेकिन किसी दिन आती और किसी दिन नहीं आती, जबकि काम करने वो रोज आती थी। एक दिन मैंने उसे बुलाकर कहा तुम्हे नहीं पढ़ना तो कोई बात नहीं है । पढ़ने-लिखने से मेरा कोई भी स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा है, मैं चाहती हूँ कि तुम केवल अपने लिए पढ़ो। उसे शायद मेरी बातें सुनकर कुछ समझ में आया और उसने पढ़ाई प्रारंभ कर दी मैंने भी उस से संकेतात्मक फीस लेने का तय किया ताकि उसे भी इस पढाई का मोल समझ में आये। हिंदी, अंग्रेजी और गणित का प्रारंभिक ज्ञान से उसकी पढाई प्रारंभ की। शुरू में उसे पढाई में ज्यादा रस नहीं आता था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा हैं उसे पढाई का महत्व समझ में आ रहा है। उसके मुख के भावों से पता चलता है कि अभी तक उसने क्या खोया है और अब वो क्या पा रही है। उसने घड़ी देखना सीखा कि कैसे घंटे और मिनिट देखते हैं किसी भी समय उसे घड़ी देखने के लिए कहो तो वह बिलकुल सही समय बताती है और अब उसे रूपये-पैसे का हिसाब-किताब सिखा रही हूँ। उसे सिक्को की पहचान बिलकुल नहीं थी लेकिन वह स्वयं बहुत मेहनत कर रही है। जितना ज्यादा वह सीख रही है उतना ही उसे अपनी अज्ञानता का पता चल रहा है। जो अज्ञानता वह अब महसूस करती है वो ही अज्ञानता उसे ज्ञान की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित कर रही है।