अपना-अपना दृष्टिकोण

Posted: मई 13, 2010 in Uncategorized
परस्थितिवश पुत्र को अपने माता-पिता के साथ रहना  पड़ा । आंशिक रूप से उन पर निर्भर रहना  पड़ा। “पिताजी” अपना ज्यादातर समय पूजा-पाठ और धार्मिक पुस्तकों को पढ़कर बिताते थे। भगवान की पूजा  करते समय दुग्धाभिषेक भी करते थे,जिसमें  कि दूध का उपयोग थोडा ज्यादा ही करते थे । एक दिन पिताजी से पुत्र ने कहा कि “आप पूजा के विधि-विधान में बहुत सा दूध उपयोग में लाते हैं। पूजा में उपयोग होने वाले दूध की मात्रा थोड़ी कम कर दीजिये। दुनिया में कितने ही बच्चों को दूध की एक बूँद भी नसीब नहीं होती है।”  उत्तर में पिताजी ने कहा ” तुम्हारे सर पर जो ये छत है वो ही बहुत हैं”।
टिप्पणियाँ
  1. Madhur says:

    There should be a open forum for discussion in home and it should be healthy.

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